जैन धर्म या जाति? जनगणना में अनसुलझे प्रश्न
जातिगत जनगणना में जैन धर्मानुयायियों को जाति के कॉलम में भी ‘जैन’ लिखने के निर्देश जारी हो रहे हैं। क्या इससे संख्या बढ़ेगी, या जैन धर्म एक जाति में सिमट जाएगा? आगम, संविधान और इतिहास की दृष्टि से एक विमर्श।
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भारत में वर्तमान में अब जातिगत जनगणना भी होनी है। लगभग सभी जगह जैन धर्मानुयायियों को जाति के कॉलम में भी ‘जैन’ ही लिखने के निर्देश जारी हो रहे हैं — जो मुझे समझ में नहीं आ रहा है। कोई इस विषय को मुझे समझा सके तो बहुत कृपा होगी, क्यों कि मुझे ऐसा लगता है कहीं हम ऐसा करके जैन बढ़ाने की जगह सिमटा न दें। इस संशय पर जबाब यह आता है कि पूरे समाज को शासन की दृष्टि में एक संख्याबल के रूप में बताने हेतु ऐसा किया जा रहा है, अन्यथा जैन हिन्दुओं की उपजातियों में गिन लिए जाएंगे।
लेकिन वे ऐसे कैसे हिन्दू की उपजाति में गिन लिए जाएंगे? जब धर्म के कॉलम में जैन लिख रहे हैं तो धार्मिक संख्या तो वहां से काउंट होगी न। और जाति के कॉलम में अपनी जाति क्षत्रिय, वणिक आदि, या अन्य उपजाति लिखेंगे तो वो जैन धर्म की जाति मानी जाएगी कि हिन्दू धर्म की? मेरा स्पष्ट मानना है कि जैन एक धर्म है, उसे जाति बताएंगे तो समस्या होगी।
मुझे समझाइये —
- हिंदू एक धर्म है, जाति में कोई हिन्दू लिखेगा?
- ईसाई एक धर्म है, जाति में कोई ईसाई लिखेगा?
- सिक्ख एक धर्म है, जाति में कोई सिक्ख लिखेगा?
- इस्लाम एक धर्म है, जाति में कोई इस्लाम लिखेगा?
कई प्रदेशों में जैन धर्म को मानने वाली जातियां कसार, सराक आदि अनेक जातियाँ हैं जिन्हें ओबीसी का दर्जा भी प्राप्त है। उनका क्या होगा? फिर कोई किसी भी जाति का व्यक्ति कभी खुद को जैन धर्म का अनुयायी नहीं कह पाएगा, क्यों कि उसकी जाति भी जैन हो जाएगी, और वह सवर्ण कहलायेगा। धर्म बदला जा सकता है, जाति नहीं। जाति है — ब्राह्मण, क्षत्रिय, बनिया, शूद्र आदि। इसी प्रकार अनेक जातियां स्थानीय स्तर पर, परंपरागत रूप से, गोत्र, परिवार और गांव के नाम से बनी हैं। वे भिन्न हैं। जैन धर्म के अनुयायियों की अधिकांश जातियां क्षत्रिय हैं। वैसे भी अन्य लगभग हर जगह जाति के कॉलम में बस यही पूछा जाता है — GEN/SC/ST/OBC। संभवतः जनगणना के फॉर्म में भी यही कॉलम हों, क्यों कि जाति का नाम पूछने लग जाएंगे तो वो हिसाब ही नहीं रख पाएंगे।
मुझे भय है कहीं इस शासन को दिखाने के चक्कर में हम अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी न मार लें। इससे सबसे बड़ा नुकसान यह हो सकता है कि कभी कोई नया व्यक्ति जैन धर्म नहीं अपनाएगा, क्यों कि वह जैन जाति से नहीं होगा — और मूल परंपरा की दृष्टि से यह जैन धर्म के विरुद्ध है। जहाँ तक जनसँख्या वृद्धि की बात है तो मात्र ज्यादा बच्चे पैदा करने से कभी जैनों की जनसँख्या में इजाफ़ा नहीं हो सकता, और इतिहास में आज तक कभी किसी धर्म की जनसँख्या मात्र इस आधार पर नहीं बढ़ी है। धर्म के प्रभाव में स्वतः अथवा जबरजस्ती पूरी की पूरी समाज, जातियों ने वो धर्म स्वीकार किये हैं तभी उस धर्म की जनसँख्या बढ़ी है, फिर चाहे बौद्ध हों, ईसाई अथवा मुस्लिम।
इस पर यह कहना कि नए वो वैसे भी नहीं आ रहे हैं — विगत 50 वर्षों में मेरे संज्ञान में कोई नहीं आया, शायद कुछ आए हों पर संख्या नगण्य है। तो क्या भविष्य की संभावना भी खत्म कर दें, ताकि नया कोई आए न, और जो हैं वो तो खत्म हो ही रहे हैं? ऐसे तो जनसंख्या उल्टी कम हो जाएगी।
अगर मैं अपनी जाति में क्षत्रिय लिखूं तो क्या समस्या है? धर्म तो जैन ही माना जाएगा। अल्पसंख्यक भी धर्म के आधार पर होता है, जाति के आधार पर नहीं। शासन तो बनता बिगड़ता रहता है, उनके मापदंड भी बदलते रहते हैं। धर्म शाश्वत है।
यदि जैन समाज खुद ही धर्म को जाति घोषित करेगा तो ‘विनाशकाले विपरीतबुद्धि:’ — ऐसा मेरा मानना है। एक बार सभी गंभीरता से विचार करें कि क्या सही है? मेरा स्वयं का कोई आग्रह नहीं है, लेकिन इसके दूरगामी परिणामों पर अवश्य विचार करना चाहिए।
कई बार सामाजिक मुद्दों पर जैन धर्म के मानने वालों का एक समूह एक जैन समाज कहलाता है और वे एक विशेष जाति के होते हैं, तो वे अपनी जाति को ही व्यवहार से जैन कहने लग जाते हैं। इसीलिए ये भ्रम खड़े होते हैं। यहाँ तक भी होता है कि कोई अन्य जाति का व्यक्ति जैन धर्म का कितना भी कठोर पालन करे, ये उसे रोटी–बेटी के सम्बन्ध के साथ नहीं अपनाते हैं — तो ये उनकी अपनी जाति की सामाजिक व्यवस्था है, न कि जैनधर्म की। प्रत्येक जाति और गोत्र में शादी विवाह, खान-पान के अपने निजी उसूल होते हैं जिनका पालन करने के लिए वे स्वतंत्र हैं। कई जैन धर्मावलम्बी भी ऐसे हैं जो अपनी ही उपजाति में विवाह आदि करना उचित मानते हैं। यद्यपि युग और वातावरण के अनुसार उनमें से कुछ के विचार परिवर्तित भी हुए हैं, किन्तु हमें उनसे यह अपेक्षा नहीं करना चाहिए कि इन कारणों से वे अपने निजी उसूलों की बलि चढ़ाएं।
फिलहाल ‘जैन लोगों को धर्म के साथ साथ जाति में भी जैन ही लिखना चाहिए’ — ऐसा फ़रमान मुझे आत्मघातक लग रहा है। जैन को जाति में समेटने का प्रयास या इस तरह की नई संकल्पना करेंगे तो और अधिक अल्पसंख्यक हो जायेंगे। यह मेरा निवेदन है, इसे विरोध के रूप में न देखा जाय। मेरी स्पष्ट मान्यता है कि जैन एक धर्म है जिसमें अनेक जातियां होती हैं, जैसे हिन्दू या सिक्ख एक धर्म है और उसमें अनेक जातियां हैं।
जैन धर्म या जाति? आगम दृष्टि
सामान्यतः लोग ‘जैन’ को जातिवाचक संज्ञा समझ लेते हैं और वर्तमान में मात्र जैन समाज के लोगों को ही जैनधर्म का अनुयायी मान लेते हैं। किन्तु वस्तुतः ‘जैन’ एक धर्म है, जाति नहीं। इसका मूलतः किसी निश्चित जाति से कोई सम्बन्ध नहीं है। किसी भी जाति का मानव जैनधर्म का पालन कर सकता है। प्राचीनकाल में ऐसा अधिकतर होता रहा है, किन्तु अब तक के इतिहास में कभी किसी को जबरन जैन धर्मानुयायी नहीं बनाया गया और न इस तरह के विश्वास को पनपने दिया गया। यहाँ जाति से तात्पर्य मात्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र से नहीं है, बल्कि मनुष्यों के अलावा पशुओं से भी है। तीर्थंकरों के समवशरण (धर्म उपदेश सभा) में उनके सर्वकल्याणकारी प्रवचन सुनने सभी जाति के मनुष्य तो आते ही थे; यहाँ तक कि पशु-पक्षियों के बैठने की भी व्यवस्था थी।
भगवान् महावीर पूर्वजन्म में सिंह थे। चारणऋद्धिधारी दो मुनियों ने आकाश मार्ग से गमन करते समय आकाश से नीचे उतर कर सिंह को सम्बोधन दिया था और सिंह को सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो गयी थी। अतः सभी संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव जैनधर्म को अपना सकते हैं तथा उसका पालन कर सकते हैं।
इसी प्रकार मनुष्यों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सभी जैनधर्म का पालन कर सकते हैं। प्राचीन परम्परा का इतिहास भी इसका गवाह है। जैनधर्म के सभी तीर्थंकर क्षत्रिय जाति के थे। भगवान् महावीर के प्रमुख शिष्य गौतम तथा अन्य दस गणधर ब्राह्मण जाति के थे। इन्हीं गौतम गणधर आदि ने भी दिगम्बर मुनि दीक्षा लेकर केवलज्ञान प्राप्त किया था और मोक्षगामी बने।
जैनधर्म के अनुसार संसार के सभी जीवों की सभी आत्मायें समान हैं तथा प्रत्येक आत्मा स्वपुरुषार्थ द्वारा आत्म विकास करता हुआ भक्त से भगवान् परमात्मा बनकर परमपद पा सकता है। इस प्रकार इस संसार में सभी लोग, चाहे वे किसी भी जाति के हों, जैनधर्म का पालन कर सकते हैं। जो लोग जैनधर्म को मात्र वैश्यों का धर्म मानते हैं या बतलाते हैं, वे वास्तव में अपनी अल्पज्ञता का ही परिचय देते हैं। वास्तव में तो जैनधर्म जन-जन का धर्म है।
दसवीं सदी के आचार्य श्री सोमदेव सूरि ने अपने नीतिवाक्यामृत ग्रंथ में कहा है कि आसन-बर्तन इत्यादि जिसके शुद्ध हों, मांस-मदिरा आदि के त्याग से जिसका आचरण पवित्र हो और नित्य स्नान आदि के करने से जिसका शरीर शुद्ध हो, ऐसा शूद्र भी ब्राह्मणादिक के समान श्रावक धर्म का पालन करने के योग्य है —
आचारानवद्यत्वं शुचिरुपस्कारः शरीरशुद्धिश्च करोति शूद्रानपि देवद्विजतपस्विपरिकर्मसु योग्यान्। — नीतिवाक्यामृत ७/१२
भट्टारक सोमसेन के त्रैवर्णिकाचार में इसी सन्दर्भ में कहा गया है कि आचार शुद्धि पूर्वक जैन धर्म का पालन करने में ये चारों वर्ण भाई-भाई के समान हैं —
विप्रक्षत्रियविट्शूद्राः प्रोक्ताः क्रियाविशेषतः। जैनधर्मे पराः शक्तास्ते सर्वे बान्धवोपमाः॥ — त्रैवर्णिकाचार ७/१४२
इस प्रकार यह स्पष्ट हो गया कि जैन धर्म में मूलतः जातिवाद का कोई स्थान नहीं है। यह एक विश्वबंधुत्व की भावना से युक्त समतावादी, सर्वकल्याणकारी आध्यात्मिक धर्म है, तथा वे सभी लोग जो स्वयं को शुद्ध आचार-विचार पूर्वक सच्चे सुख के मार्ग पर लगाना चाहते हैं, वे सभी जैनधर्म का पालन कर जैन धर्मानुयायी बन सकते हैं। उन्हें अपनी जाति को लेकर चिन्तित होने की जरूरत नहीं है।
सिद्धान्ताचार्य पंडित फूलचंद शास्त्री जी अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘वर्ण जाति और धर्म’ (पृष्ठ 29-30) में स्पष्ट लिखते हैं कि धर्म में जाति और कुल को स्थान नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि —
मनुष्य जाति में चाण्डाल से निष्कृष्ट कर्म अन्य किसी जाति का नहीं होगा। इस कर्म को करने वाला व्यक्ति भी जब सम्यग्दर्शन जैसे लोकोत्तर धर्म का अधिकारी हो सकता है, तब अन्य को इसके अधिकारी न मानने की चर्चा करना कैसे सम्भव हो सकता है?
वे आगे लिखते हैं कि वास्तव में जैनधर्म में ज्ञान की विपुलता, लौकिक पूजा-प्रतिष्ठा, इक्ष्वाकु आदि कुल, ब्राह्मण आदि जाति, शारीरिक बल, धनादि सम्पत्ति, तप और शरीर — इनका महत्व नहीं है। इस धर्म में दीक्षित होने वाला तो ज्ञानादि जन्य आठ मदों को त्याग कर ही उसकी दीक्षा का अधिकारी होता है। इतना सब होते हुए भी जो जाति, रूप, कुल, ऐश्वर्य, शील, ज्ञान, तप और बल का अहङ्कार कर दूसरे धर्मात्माओं का अनादर करता है, वह अपने धर्म का ही अनादर करता है (रत्नकरण्डश्रावकाचार, श्लोक २६), और उसके नीच गोत्रकर्म का बन्ध होता है।
जाति और कुल का तो अहङ्कार इसलिए भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये काल्पनिक हैं। लोक में जन्म के बाद प्रत्येक व्यक्ति के नाम रखने की परिपाटी है, इससे विवक्षित अर्थ का बोध होने में बड़ी सहायता मिलती है। चार निक्षेपों में नाम निक्षेप मानने का यही कारण है। किन्तु इतने मात्र से नाम को वास्तविक नहीं माना जा सकता, क्योंकि जिस प्रकार माता के उदर से शरीर की उत्पत्ति होती है, उस प्रकार उसके उदर से नाम की उत्पत्ति नहीं होती। यह तो उसके पृथक् अस्तित्व का बोध कराने के लिए माता पिता आदि बन्धु वर्ग के द्वारा रखा गया संकेत मात्र है। जाति और कुल के अस्तित्व की लगभग यही स्थिति है। ब्राह्मण आदि जाति और इक्ष्वाकु आदि कुल न तो जीव रूप हैं, न शरीर रूप ही, और न दोनों रूप ही। वास्तव में ये तो प्रयोजन विशेष से रखे गये संकेत मात्र हैं, अतः धर्म के धारण करने में न तो ये बाधक हैं और न साधक ही।
हाँ, यदि इनका अहङ्कार किया जाता है तो अवश्य ही इनका अहङ्कार करने वाला मनुष्य धर्म धारण करने का पात्र नहीं होता, क्योंकि जाति का सम्बन्ध आत्मा से न होकर शरीर (आजीविका) से है, और शरीर भव का मूल कारण है। इसलिए जो धर्माचरण करते हुए जाति का आग्रह करते हैं वे संसार से मुक्त नहीं होते (समाधितन्त्र, श्लोक ८८)। धर्म आत्मा का स्वभाव है। उसका सम्बन्ध जाति और कुल से नहीं है।
इसी पुस्तक के पृष्ठ 50 पर वे उल्लेख करते हैं कि जैन धर्म प्राणी मात्र का धर्म है और वह वर्णाश्रम धर्म से भिन्न है। इसी भाव को व्यक्त करते हुए आचार्य पूज्यपाद समाधितन्त्र में कहते हैं —
जातिर्देहाश्रिता दृष्टा देह एव आत्मनो भवः। न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये जातिकृताग्रहाः॥८८॥ जाति-लिङ्गविकल्पेन येषां च समयाग्रहः। तेऽपि न प्राप्नुवन्त्येव परमं पदमात्मनः॥८९॥
अर्थात् जाति देह के आश्रय से देखी जाती है और आत्मा का संसार एक मात्र यह देह है, इसलिए जो जातिकृत आग्रह से युक्त हैं वे संसार से मुक्त नहीं होते ॥८८॥ ब्राह्मण आदि जाति और जटाधारण आदि लिङ्ग के विकल्प से जिनका धर्म में आग्रह है, वे भी आत्मा के परम पद को प्राप्त नहीं होते ॥८९॥
जैनधर्म किसी जाति विशेष का धर्म नहीं है। उसका दरवाजा सबके लिए समान रूप से खुला हुआ है। श्रावकधर्म दोहा के कर्ता ने श्रावकधर्म का उपसंहार करते हुए इस सत्य को बड़े ही मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया है —
एहु धम्मु जो आयरइ बंभणु सुद्दु वि कोइ। सो सावउ किं सावयहं अण्णु कि सिरि मणि होइ॥७६॥
अर्थात् ब्राह्मण हो चाहे शूद्र, जो कोई इस धर्म का आचरण करता है वही श्रावक है। और क्या श्रावक के सिर पर कोई मणि रहता है?
जाति का अर्थ
जाति का अर्थ शरीर से होता है और जन्म से उसका सम्बन्ध होता है। जैसे हिन्दू एक धर्म है, उसमें अनेक जातियां हैं — सवर्ण भी हैं, पिछड़े, अन्य पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़े, जनजाति, आदिवासी आदि सभी हैं, लेकिन उन सभी का धर्म हिन्दू है। इसी तरह सिक्ख धर्म और बुद्ध धर्म वाले भी हैं; इन धर्मों के अंतर्गत अनेक प्रकार की जातियां आ जाती हैं। इसी तरह जैन भी एक धर्म है — उसके अंतर्गत कई जातियां और समुदाय आ जाते हैं।
रूढ़ि से यह प्रसिद्ध हो गया कि वणिक ही जैन होते हैं, लेकिन यह बात सही इसलिए नहीं है क्यों कि अनेक वणिक जैन नहीं हैं और सभी जैन वणिक नहीं हैं। वर्तमान में जैन धर्म के अनुयायियों की अधिकांश जातियां क्षत्रिय हैं। सराक एक जाति है, कसार एक जाति है, जो जैन धर्मावलम्बी हैं किन्तु वे वणिक और सवर्ण नहीं हैं; इनमें अनेक आदिवासी और पिछड़े वर्ग के हैं। जाति के कॉलम में जैन लिखने से जैन सिर्फ एक निश्चित जाति में सीमित हो जायेंगे तथा संख्या और कम आएगी — ऐसा मेरा अनुमान है। जब जैन नाम की कोई जाति है ही नहीं, तो फिर यह भ्रम क्यों खड़े किये जा रहे हैं? ऐसा न हो कल को यह अज्ञानता हमें ही भारी पड़ जाये।
धार्मिक और सैद्धांतिक दृष्टि से तो दो ही जातियां हैं — १. मनुष्य, २. तिर्यंच। सामाजिक दृष्टि से वर्ण को भी जाति के रूप में देखा जाता है, वे मुख्य चार हैं — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वणिक और शूद्र। सरकारी दृष्टि से किसी भी फार्म आदि में जाति होती हैं — सामान्य, पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति आदि। इसमें ही जैन धर्मावलम्बी अपनी निजी जातियां तय करके बता दें कि वे क्या हैं, और वे कुछ भी हो सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई ब्राह्मण जाति का व्यक्ति यह कह सकता है कि मैं जैन धर्म का अनुसरण करता हूँ अतः मैं जैन हूँ। धर्म तो धारण करने का नाम है न।
जैन हिन्दू हैं या नहीं हैं?
एक उलझन यह भी बनी रहती है कि जैन हिन्दू हैं या नहीं हैं? इस प्रश्न का उत्तर मैं जैन सिद्धांत स्याद्वाद के माध्यम से देना उचित समझता हूँ। भावुकता और आग्रह छोड़कर थोड़ा धैर्य से इस बात को समझियेगा। ‘हिन्दू’ शब्द की परिभाषा समय, संदर्भ और दृष्टिकोण के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपों में समझी और समझाई गई है। पहले हिन्दू शब्द मुख्यतः तीन अर्थों में प्रचलित था — एक हिन्दू भूगोल, दूसरा हिन्दू संस्कृति और तीसरा हिन्दू धर्म।
पहले हिन्दू शब्द मूलतः धार्मिक नहीं, बल्कि भौगोलिक पहचान के रूप में प्रयोग हुआ था। प्राचीन फ़ारसी भाषा में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ हो जाता था, जैसे वे सप्त को हफ्त बोलते थे और सप्ताह को हफ्ता बोलते थे। सिन्धु नदी के ‘सिन्धु’ शब्द से ‘हिन्दू’ शब्द बना है — ‘स’ को ‘ह’ का उच्चारण करने वालों ने ऐसा किया था। सिन्धु नदी के पार रहने वालों को फ़ारसी लोग ‘हिन्दु’ कहने लगे। ग्रीक लेखकों ने इसे Indus / India कहा। अतः प्रारम्भ में ‘हिन्दू’ का अर्थ था — सिन्धु नदी के इस पार रहने वाला व्यक्ति। चूँकि जैन धर्म के अनुयायी मूलतः यहीं के थे, अतः इस दृष्टि से वे हिन्दू ही कहे जायेंगे।
अतः हिन्दू शब्द एक सम्पूर्ण सभ्यता और एक सम्पूर्ण संस्कृति का सूचक है, जिसके आधार पर अपने भारत देश का ‘हिन्दुस्तान’ नाम भी पड़ा और भाषा का नाम भी ‘हिन्दी’ आया। सांस्कृतिक रूप से हिन्दू वह है जो कर्म और पुनर्जन्म में विश्वास करता हो, धर्म (कर्तव्य) को जीवन का आधार मानता हो, विविधता में एकता को स्वीकार करता हो, सहिष्णुता और अहिंसा को मूल्य मानता हो, हिंसा न करता हो — और इस आधार पर इस हिन्द देश की सभी मूल सभ्यतायें हिन्दू ही हैं। जैनधर्म इसी हिन्द देश का मूल धर्म रहा है; इसके अनुयायियों ने इसी संस्कृति को हमेशा संरक्षण दिया, पालन किया और बढ़ाया। इसी संस्कृति का नाम हिन्दू संस्कृति पड़ गया। अतः इस दृष्टि से निश्चित रूप से जैन संस्कृति हिन्दू संस्कृति ही है।
अब प्रश्न है हिन्दू धर्म का। भारत में प्राचीन काल से दो धारायें एक साथ बह रही हैं — श्रमण और वैदिक। पहले श्रमण धारा में सिर्फ जैन ही आते थे, बाद में बौद्ध धर्म को भी श्रमणों में सम्मिलित मान लिया गया। बहुत पहले तक हिन्दू धर्म कोई पृथक् धर्म नहीं था; धर्म थे — वैदिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन इत्यादि। कालान्तर में कुछ कट्टरपन्थियों ने हिन्दू धर्म का अर्थ किया वैदिक। अब हिन्दू एक संस्कृति होने के साथ-साथ एक धर्म भी कहा जाने लगा। इस प्रकार वैदिक परम्परा को न मानने के कारण जैन और बौद्ध दोनों ही अवैदिक अर्थात् अ-हिन्दू धर्म माने गये।
अगर हिन्दू का अर्थ वैदिक है तो निश्चित रूप से जैन हिन्दू नहीं हैं। धार्मिक और दार्शनिक दृष्टि से जैन धर्म और हिन्दू धर्म के अनेक अंतर गिनाये जा सकते हैं जो किसी भी कीमत पर एक नहीं हो सकते। आजकल कुछ लोग समन्वय की बात अवश्य करते हैं जिसमें कोई बुराई नहीं है, और यह जब तक समन्वय तक सीमित रहता है तब तक तो ठीक लगता है। किन्तु कभी कभी जब इस समन्वय के पीछे विलय की गंध आने लगती है और समन्वय इस शर्त या आग्रह पर किया जाता है कि मूल तो हम हैं और तुम तो एक शाखा मात्र हो — तब इस छद्म समन्वय से हमें सतर्क हो जाना चाहिए, और अपनी मौलिकता और अस्तित्त्व के रक्षण के लिए हमें यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि जैनधर्म हिन्दूधर्म से अलग और स्वतंत्र धर्म है।
इस बात पर अनेक स्वघोषित इतिहासकार और विद्वान् जैन परंपरा में श्री राम, श्री कृष्ण, श्री हनुमान आदि से सम्बंधित उल्लेखों को उद्धृत करके यह घोषणा करते हैं कि जैन ग्रंथों में हिन्दू देवी देवताओं के उल्लेख होने से वे हिन्दू ही हैं। उन्हें मैं यह कहना चाहता हूँ कि आज बहुमत और बाहुबल से भले ही आप यह कहें, लेकिन यथार्थ यह है कि जैन ग्रंथों में ये जैन भगवान् हैं और उनका वीतरागी आराध्य स्वरूप वैसा ही है जैसा भगवान् महावीर का है। उनकी कथा कहानियां भी भिन्न प्रकार की हैं, उनके उपदेश और धर्म भी जैनदर्शन की मुख्य धारा वाले ही हैं। और अगर तर्क का आधार ग्रंथों में उल्लेख मात्र को बनायेंगे, तो वेदों और वैदिक पुराणों में तीर्थंकर आदि की जो स्तुतियाँ की गईं हैं उससे तो यह भी सिद्ध हो सकता है कि सभी हिन्दू जैन हैं।
यह भारत की व्यापक और समन्वयवादी धार्मिक संस्कृति की खूबसूरती ही है कि वे प्रत्येक परंपरा के उपास्यों को सम्मान देते हैं और अपने ग्रंथों में उनका सम्मान पूर्वक उल्लेख करते हैं। दरअसल प्राचीन काल से भारत में जो सनातन धर्म उपस्थित रहा है वह हमेशा से दो रूपों में रहा है — एक वैदिक और दूसरा श्रमण। दोनों एक ही पिता की दो संतानें हैं; ये एक पिता के होने से एक भी हैं और अलग अलग दर्शन होने से अलग अलग भी हैं। वैदिक प्रवृत्ति प्रधान तथा श्रमण निवृत्ति की प्रधानता को लिए हुए हैं। ये दोनों भारतीय ज्ञान और साधना परंपरा रुपी नदी के दो तट हैं। ये एक दूसरे के विरोधी भी हैं और पूरक भी हैं; एक के बिना दूसरे का अस्तित्त्व नहीं है। इन्हें आप मिला भी नहीं सकते और जुदा भी नहीं कर सकते। इनके स्वतंत्र अस्तित्त्व से ही दोनों की गरिमा है। इनमें जहाँ एक तरफ बहुत समानताएं हैं तो असमानताएं भी बहुत हैं।
संविधान में हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार हिन्दू में शामिल हैं — हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख (यदि वे मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी न हों)। इसमें भी भौगोलिकता, सभ्यता और संस्कृति के नाम पर हिन्दू विवाह अधिनियम नामकरण हुआ है। धार्मिक आधार पर तो इसका वर्गीकरण और स्पष्टीकरण हुआ है, क्यों कि उसमें पुनः हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख लिखे गए हैं। यदि जैन हिन्दू है तो अकेला हिन्दू ही लिखते, जैन क्यों लिखा? वास्तव में यह मूल भारतीय और अभारतीय धर्मों के भेद को स्पष्ट दर्शाने का स्पष्टीकरण है, और यही कारण है कि कोष्ठक में लिखा गया — हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख (यदि वे मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी न हों)।
यही व्याख्या अनुच्छेद २५ के सन्दर्भ में भी की जा सकती है, जहाँ लिखा है — ‘इसमें हिंदुओं के सभी वर्गों और वर्गों के लिए सामाजिक कल्याण और सार्वजनिक चरित्र की हिंदू धार्मिक संस्थाओं में सुधार या उन्हें खोलने का प्रावधान है। इस प्रावधान के अंतर्गत हिंदुओं में सिख, जैन या बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग भी शामिल माने जाएंगे तथा हिंदू संस्थाओं को भी तदनुसार माना जाएगा।’
स्पष्ट है कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से संविधान में भी, कानून की दृष्टि से, हिन्दू धर्म एक समुच्चयवाची संज्ञा है जो भारतीय मूल धर्मों के लिए उपयोग में लायी गई है, और उसके अंतर्गत हिन्दू, जैन, बौद्ध और सिक्ख धर्म स्वीकार किये गए हैं। हम चाहें तो इसके और अधिक उपभेद करके इसको समझ सकते हैं — १. बहुसंख्यक हिन्दू, २. अल्पसंख्यक हिन्दू। इसमें दूसरे उपभेद अल्पसंख्यक हिन्दू में जैन, बौद्ध और सिक्ख सम्मिलित हैं।
निष्कर्ष यह है कि एक भौगोलिकता, संस्कृति और सभ्यता के रूप में शुद्ध भारतीय होने से जैन हिन्दू हैं, और धार्मिक रूप से जैन हिन्दू नहीं हैं। एक धर्म की दृष्टि से, तथा परंपरागत और संवैधानिक रूप में भी, हिन्दू धर्म और जैन धर्म दोनों अलग अलग परिगणित होते हैं।
बहुत से लोग आज भी जैनधर्म को हिन्दू धर्म (वैदिक) की एक शाखा बतलाकर उसको हिन्दू धर्म के अन्तर्गत ही मान लेते हैं, जबकि स्थिति ऐसी नहीं है। सभी देशवासियों को यह बात समझनी होगी कि भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा का नाश करके एकत्व की स्थापना कभी नहीं की जा सकती। ‘अनेकता में एकता’ — यह भारतीय संस्कृति की आत्मा है। भारत वह है जहाँ अनेक धर्मों ने जन्म लिया; निश्चित रूप से वे अलग अलग हैं, नहीं तो ‘अनेक’ शब्द का प्रयोग नहीं होता, और अनेक का प्रयोग नहीं होता तो एकता की बात भी नहीं आती। यदि भारत का एक ही धर्म है — ‘हिन्दू’, तो फिर ‘अनेकता में एकता’ वाली विशेषता ही निर्मूल हो जाएगी। और यह स्पष्ट कर दें कि शाखाओं का नाम अनेकता नहीं होता है; अन्य विदेशी धर्मों में भी अन्दर ही अन्दर अनेक शाखाएं होती हैं लेकिन वे ‘एक’ कहलाते हैं, अनेक नहीं — इसलिए ‘अनेकता में एकता’ की विशेषता वहां नहीं कही जाती।
विविधता और भिन्नता की खूबी से ही एक उपवन गुलजार होता है। अगर पड़ोसी के उपवन में सिर्फ हरा रंग है और उसकी प्रतिस्पर्धा में हम अपने उपवन को भी एक ही रंग में रंगना चाहते हैं, तो हम न सिर्फ अपनी खूबसूरती और मौलिकता को नष्ट कर रहे हैं, बल्कि भविष्य में उन्हीं समस्याओं से ग्रसित होने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए जिनसे वे आज ग्रसित हैं।
अब रही हिन्दू सामाजिक एकता और राष्ट्रभक्ति की बात, तो उसमें जैन को कभी कोई आपत्ति नहीं रही, न है और न रहेगी। इनकी तो उदारता इतनी ज्यादा है कि भले ही अनेक जैन मंदिरों पर हिन्दू कब्ज़ा किये बैठे हों, लेकिन यह सब भूल कर भी ये हिन्दू संगठनों और पार्टियों में न सिर्फ सेवाएं देते हैं बल्कि अकूत धन भी दान में देते हैं। जैन धर्म और तीर्थ की रक्षा में कोई भले ही इनके साथ न रहे, पर हिन्दू धर्म के आंदोलनों को अपना आन्दोलन समझ कर उनके साथ कदम से कदम मिला कर चलते हैं।
किन्तु जब अपने मूल स्वरुप पर ही खतरा मंडराने लगे तो उन्हें कहना पड़ता है और बताना पड़ता है कि हमेशा की तरह आज भी भारतवर्ष में जैनधर्म एक स्वतन्त्र, मौलिक और सम्पूर्ण धर्म है। भारत सरकार ने धार्मिक आधार पर ही इन्हें अल्पसंख्यक घोषित किया है। देश के प्रत्येक कोने में बसा जैन समाज एक स्वतन्त्र समाज है। उनके स्वतन्त्र मौलिक मन्दिर, स्वतन्त्र मौलिक आगम-शास्त्र, स्वतन्त्र मौलिक पूजा-पद्धति तथा स्वतन्त्र मौलिक जीवन शैली, संस्कृति, कला, पुरातत्त्व, इतिहास एवं मान्यतायें हैं। शुद्ध खान-पान, सिद्धांत, आचार विचार, विशुद्ध शाकाहार और अहिंसा में विश्वास करने वाली, संयम-तप और नैतिक जीवन मूल्यों में आस्था वाली, मारकाट, दंगों, साम्प्रदायिक हिंसा और भ्रष्टाचार आदि बुराइयों से दूर, शान्तिप्रिय, शिक्षित, सभ्य, स्वदेश प्रेमी जैन समाज अपने इस प्यारे भारत देश में मानवीय मूल्यों की खुलकर होती त्रासदी तथा अन्धविश्वासों के बीच एक प्रकाशपुंज है, जो भविष्य को सही रास्ता दिखा रही है।
जनगणना में क्या करना चाहिए?
विगत २०११ की जनगणना में जैन धर्मावलम्बियों की जनसँख्या महज 46 लाख के लगभग दर्ज की गई थी, जबकि जैन समाज का दावा है कि भले ही वे अन्य की अपेक्षा कम हैं लेकिन इतने भी कम नहीं हैं। एक अनुमान के आधार पर आज भी जैन धर्मावलम्बियों की संख्या लगभग चार करोड़ होना चाहिए। सरकारी आंकड़ों में इतनी कम गणना होने के पीछे जो कारण समझ में आये, वे निम्नलिखित प्रकार के हैं —
- अधिकांश जनगणना कर्मियों द्वारा स्वतः ही फॉर्म में जैन धर्मावलम्बियों को अज्ञानतावश हिन्दू धर्म के कॉलम में जोड़ देना।
- जैन धर्मावलम्बियों के नाम के आगे ‘जैन’ न लगा कर गोत्र — सेठी, सेठिया, सिंघई, बच्छावत, सिंह आदि लगाना, या मूल गाँव या जाति का नाम लगाना।
- अज्ञानता के कारण स्वयं को जाति के कॉलम में ‘जैन’ और धर्म के कॉलम में ‘हिन्दू’ लिखवा देना।
- इस विषय को गंभीरता से न लेना।
- अपनी स्वयं की निजी प्रामाणिक सामाजिक और धार्मिक सर्वे न करवाना।
आगामी जनगणना में निम्नलिखित सतर्कता यदि जैन धर्मावलम्बियों द्वारा अपनाई जाए, तो निश्चित रूप से वे अपनी वास्तविक संख्या प्राप्त कर सकते हैं —
- जनसँख्या का फॉर्म अब डिजिटल भी आने वाला है, अतः स्वयं फॉर्म भरें।
- धर्म के कॉलम में सिर्फ ‘जैन’ लिखवाएं।
- भाषा के कॉलम में अपनी भाषा ‘प्राकृत’ दर्ज करें।
- समाज में जन जागरण हेतु गाँव गाँव में इसके कार्यक्रम आयोजित करें।
- प्रत्येक मंदिर, उपासरे, स्थानक, स्वाध्याय भवन, धर्मशाला आदि में इसके पोस्टर बना कर लगायें।
- समाज के सभी विद्वान्, मनीषी, वक्ता, साधु-साध्वियां अपने प्रवचन उद्बोधनों में इस हेतु प्रेरित करें।
- सोशल मीडिया पर इसकी आधिकारिक पोस्ट जारी करें।
- कम से कम जैन टीवी चैनलों पर नियमित इसका विज्ञापन चलवायें।
- प्रत्येक स्थान का समाज अपने स्थान पर सरकारी विद्यालयों के प्राचार्य और अध्यापकों को आमंत्रित कर उनकी कार्यशाला करें और उन्हें यह भेद ज्ञान करवाएं, क्यों कि अधिकांश जनगणना इनके माध्यम से ही करवाई जाती है। उन्हें अपनी तरफ से कुछ सुविधाएँ प्रदान करें।
Frequently Asked Questions
क्या जनगणना के जाति वाले कॉलम में ‘जैन’ लिखना चाहिए?
लेख के अनुसार नहीं। जैन एक धर्म है, जाति नहीं। धर्म के कॉलम में ‘जैन’ अवश्य लिखवाएं, किन्तु जाति के कॉलम में अपनी वास्तविक जाति दर्ज करें। जाति के कॉलम में ‘जैन’ लिखने से जैन एक निश्चित जाति में सिमट सकते हैं और संख्या और कम आ सकती है। अल्पसंख्यक का दर्जा भी धर्म के आधार पर मिलता है, जाति के आधार पर नहीं।
क्या ‘जैन’ एक जाति है या एक धर्म?
जैन एक धर्म है, जिसके अंतर्गत अनेक जातियां और समुदाय आते हैं — ठीक वैसे ही जैसे हिन्दू या सिक्ख एक धर्म है और उसमें अनेक जातियां हैं। जैन नाम की कोई जाति है ही नहीं। वर्तमान में जैन धर्म के अनुयायियों की अधिकांश जातियां क्षत्रिय हैं, तथा सराक और कसार जैसी जातियां भी जैन धर्मावलम्बी हैं जो वणिक या सवर्ण नहीं हैं।
क्या कोई भी जाति का व्यक्ति जैन धर्म का पालन कर सकता है?
हाँ। जैनधर्म का सम्बन्ध मूलतः किसी निश्चित जाति से नहीं है। सभी तीर्थंकर क्षत्रिय जाति के थे, जबकि भगवान् महावीर के प्रमुख शिष्य गौतम सहित ग्यारह गणधर ब्राह्मण जाति के थे। आचार्य सोमदेव सूरि के नीतिवाक्यामृत और आचार्य पूज्यपाद के समाधितन्त्र जैसे ग्रंथ स्पष्ट कहते हैं कि धर्म धारण करने में जाति और कुल न बाधक हैं न साधक। जैनधर्म जन-जन का धर्म है।
क्या जैन हिन्दू हैं?
लेख इसका उत्तर स्याद्वाद की दृष्टि से देता है। भौगोलिकता, सभ्यता और संस्कृति के रूप में शुद्ध भारतीय होने से जैन हिन्दू हैं, किन्तु धार्मिक दृष्टि से जैन हिन्दू नहीं हैं। यदि हिन्दू का अर्थ वैदिक है तो जैन धर्म उससे अलग और स्वतंत्र धर्म है। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 तथा अनुच्छेद २५ में हिन्दू के साथ जैन, बौद्ध और सिख को अलग से गिनाया जाना भी इसी भेद को दर्शाता है।
2011 की जनगणना में जैन संख्या इतनी कम क्यों दर्ज हुई?
2011 में जैन जनसंख्या लगभग 46 लाख दर्ज हुई, जबकि अनुमान लगभग चार करोड़ का है। इसके कारण हैं — जनगणना कर्मियों द्वारा अज्ञानतावश जैनों को हिन्दू कॉलम में जोड़ देना; नाम के आगे ‘जैन’ के स्थान पर सेठी, सिंघई, बच्छावत जैसे गोत्र या गाँव-जाति का नाम लगाना; अज्ञानतावश जाति के कॉलम में ‘जैन’ और धर्म के कॉलम में ‘हिन्दू’ लिखवा देना; विषय को गंभीरता से न लेना; और अपना प्रामाणिक सामाजिक-धार्मिक सर्वे न करवाना।
आगामी जनगणना में जैन समाज को क्या सतर्कता बरतनी चाहिए?
फॉर्म स्वयं भरें, क्यों कि वह अब डिजिटल भी उपलब्ध होगा। धर्म के कॉलम में सिर्फ ‘जैन’ लिखवाएं और भाषा के कॉलम में ‘प्राकृत’ दर्ज करें। गाँव-गाँव जन जागरण कार्यक्रम करें, मंदिरों और स्थानकों में पोस्टर लगायें, साधु-साध्वियों और वक्ताओं के माध्यम से प्रेरणा दें, सोशल मीडिया और जैन टीवी चैनलों पर प्रचार करें, तथा सरकारी विद्यालयों के प्राचार्यों और अध्यापकों की कार्यशाला करें, क्यों कि अधिकांश जनगणना इन्हीं के माध्यम से करवाई जाती है।
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